अमेरिका में एक बार फिर से मंदी आ रही है और तकनीकी जगत से जुड़े कई लोग नौकरी छोड़कर खुद का उद्यम इस आशा के साथ खड़ा कर रहे हैं कि वे जल्द ही फ्रीलांस आईटी करोड़पति बन जाएंगे। कठिन समय होने के कारण कंपनियों में लागत में कमी लाने पर जोर है जिससे पूर्णकालिक कर्मचारी रखने की जगह फ्रीलांसर से काम लेना पसंद किया जा रहा है।
दिल्ली के पास का उपनगरीय इलाका नोएडा, दोपहर के एक बजे हैं। आईटी आउटसोर्सिंग कंपनी साईनैप्स कम्यूनिकेशंस के ठीक सामने एक पान की दुकान है और उसके बगल में एक मूंगफली बेचने वाला भी बैठा हुआ है। कंपनी के सामने ही एक नाई की दुकान है जहां खुले में ही ग्राहकों की दाढ़ी बनाई जा रही है। लेकिन जैसे ही हम साईनैप्स के अंदर जाते हैं, माहौल बिल्कुल बदल जाता है। दीवार पर प्रशांत क्षेत्र, न्यू यॉर्क, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन का समय दर्शाने वाली घड़ियां लगी हुई हैं। ऑफिस पूरी तरह से वातानूकूलित है और फर्श चमकदार मार्बल से सजी हुई है। साईनैप्स की शुरुआत 2001 में 26 वर्षीय शमित सिन्हा द्वारा 6 लाख रुपये की पूंजी से की गई थी। सिन्हा ने फ्रीलांस आईटी कंपनी इलैंस डॉट कॉम से पांच कंप्यूटर किराये पर लिए थे। अब साईनैप्स में 200 कर्मचारी काम करते हैं और इसका सालाना कारोबार 20 लाख डॉलर (करीब 8 करोड़ रुपए) तक पहुंच गया है।
आपको 24 साल के राहुल महाजन का उदाहरण बताते हैं जिन्होंने विप्रो की नौकरी छोड़ दी और अब पश्चिमी दिल्ली के जनकपुरी में इलैंस डॉट कॉम के माध्यम से अपनी कंपनी जाइकॉम सॉल्यूशंस शुरू की है। पूंजी के नाम पर उनके पास सिर्फ एक कंप्यूटर और अपना तकनीकी कौशल ही था। महाजन ने बताया, 'जब मैंने अच्छी नौकरी छोड़ दी तो मेरे मां-बाप चिंतित लग रहे थे। मैं अपनी पहली नौकरी में ही 50,000 रुपये महीने का वेतन ले रहा था, लेकिन मैं कुछ और बड़ा करना चाहता था। इसलिए मैं अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर एक उद्यमी बन गया।'
आज महाजन लाखों डॉलर की कमाई कर रहे हैं और पिछले साल सिर्फ इलैंस डॉट कॉम के माध्यम से उन्होंने 6 लाख डॉलर की कमाई की है। महाजन को कई विदेशी ग्राहक मिल चुके हैं और वह पीएचपी, एजेएएक्स, एएसपीडॉटनेट, फ्लैश और वेब 2.0 जैसी टेक्नॉलजी पर काम करने के लिए हर घंटे 20 डॉलर वसूलते हैं।
इलैंस डॉट कॉम आईटी की फ्रीलांसिंग कराने वाला एक प्लेटफॉर्म है और इसके माध्यम से फ्रीलांस काम करने वाले लोगों को और किसी प्रॉजेक्ट को आउटसोर्स करने वाली कंपनियों के साथ जोड़ा जाता है। इलैंस डॉट कॉम या गेटअकोडर डॉट कॉम, गुरु डॉट कॉम, ओडेस्क डॉट कॉम जैसे प्लेटफॉर्म के माध्यम से आप क्रिएटिव लेखन, संपादन, इंटीरियर डिजाइनिंग, किसी पोर्टल या कंप्यूटर एप्लीकेशन के विकास जैसे किसी भी कंप्यूटर जॉब को फ्रीलांसर के तौर पर कर सकते हैं।
ईटी संवाददाता ने इस परिघटना को समझने के लिए अमेरिका के प्रशांत तटीय इलाके में करीब 12,500 किलोमीटर की यात्रा की। उत्तरी कैलिफोर्निया के खूबसूरत पहाड़ों के बीच गंदी सड़कों की जगह अब तराशी हुई कॉन्क्रीट की सड़कें ले चुकी हैं, जिन पर वसंत के आगमन का संकेत देती हुई मेपल की पीली पत्तियां बिखरी हुई थीं। इन सड़कों पर न तो साइकिल मरम्मत की कोई दुकान दिखती है और न ही कोई मूंगफली बेचने वाला। लेकिन दुनिया की सबसे बड़ी टेक्नॉलजी कंपनियों फेसबुक, गूगल, सिमैंटेक, वेरीसाइन, सिलिकॉन ग्राफिक्स, सन माइक्रोसिस्टम्स, अडॉब और इलैंस डॉट कॉम के कार्यालयों के सामने बने बहुमंजिली पार्किंग में बीएमडब्ल्यू, मर्सिडीज और लिनकोंस की एक के ऊपर एक परतें जरूर दिखती हैं।
कई अन्य आईटी सविर्स प्रदाता कंपनियों की तरह इलैंस डॉट कॉम ने भी अपनी शुरुआत उस दौर में की जब डॉट कॉम की लहर ठंडी पड़ रही थी।
इलैंस डॉट कॉम के सीईओ फैबियो रोजेटी ने बताया, ''जब हर कोई सिलिकॉन वैली से भाग कर अमेरिका के पूवीर् तट की ओर जा रहा था, तो मैं पहला ऐसा व्यक्ति था जो पश्चिम की ओर गया। मेरे परिवार, खासकर मेरी मां और पत्नी का मानना था कि मंै पागल हो गया हूं।'' फैबियो ने केपजेमिनी में अपनी नौकरी छोड़कर उद्यमी बनने का फैसला किया। इलैंस डॉट कॉम के सबसे बड़े और सबसे धनी सेवा प्रदाता भारत में ही हैं। कुछ में तो कर्मचारियों की संख्या इलैंस से भी ज्यादा हो गई है, जबकि अमेरिका की डिग डॉट कॉम जैसे कई सेवा प्रदाता भी काफी बड़े हो गए हैं। आज इलैंस हर सप्ताह करीब 10 लाख डॉलर का कारोबार करती है। साल 2007 में कंपनी की आमदनी 4 करोड़ डॉलर को पार कर गई। कंपनी की योजना अगले दो-तीन साल में इसे बढ़ाकर 20 करोड़ डॉलर तक पहुंचाने तथा सूचीबद्घ होने की है। इलैंस वेबपेज डिजाइनिंग जैसे कायोंर् की भी आउटसोर्सिंग करवाती है। समय के भीतर पूरे होने वाले प्रॉजेक्ट के लिए कंपनी 500 डॉलर से लेकर 1,000 डॉलर तक दे सकती है और इसके लिए बोली कभी भी लगाई जा सकती है।
अमेरिका में मंदी को देखते हुए इस प्रकार के फ्रीलांस अवसर काफी बढ़ रहे हैं। छोटे व मध्यम कारोबारी व व्यक्ति भी छोटे कामों जैसे लोगो डिजाइन करने, वेबसाइट बनाने, वेबसाइट या किसी एप्लीकेशन के रखरखाव के लिए इस प्रकार के प्लेटफॉर्म के द्वारा आउटसोर्सिंग को वरीयता दे रही हैं। इसका कारण जानना आसान है। कोई भी बड़ी कंपनी 2,000 डॉलर से 10,000 डॉलर तक के छोटे आउटसोर्सिंग कार्य नहीं करना चाहती। इसके अलावा रुपये की मजबूती की वजह से बड़ी व मध्यम कंपनियों ने अपना मार्जिन बनाए रखने के लिए अपने बिलिंग रेट बढ़ा दिए हैं। बड़े सौदे कम मिलने की वजह से अब कंपनियां नौकरी कम दे रही हैं और वेतन भी घट गया है। डॉट कॉम में मंदी के बाद बरबाद हो चुकी कुछ कंपनियों ने इस तरह के मॉडल अपनाने शुरू कर दिए हैं। साइनैप्स के शमित सिन्हा ने कहा, 'उद्यमी बनाने वाले इस तरह के प्लेटफॉर्म की मदद से बड़े आदमी बनने के लिए तकनीकविदों को थोड़ा धैर्य रखना होगा।'
Source: इकनॉमिक टाइम्स हिंदी 26 Mar 2008, 0110 hrs IST,ईटी
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Wednesday, April 9, 2008
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