झारखंड प्रकृति के आंचल में एक ऐसा प्रदेश है जहां की हवाओं, घटाओं, पर्वत, पानी और मिट्टी में समृद्धि की गाथा लिखी हुई है। यहां की संस्कृति यहां की परंपरा खुले आकाश के नीलवर्ण जैसा पारदर्शी है। ईश्वर ने मुक्त हाथों से इस राज्य को सौगात दिए हैं और ऐसी पृष्ठभूमि में यहां का सौंदर्य यहां के फूल यहां के झरने यहां के गीत अगर फ़िल्मों के माध्यम से बांटी जाय तो सारे लोग बरबस ही इस ओर आकर्षित होंगे ऐसा मैं मानता हूं। कुछ लोगों ने झारखंड प्रदेश में बहुत पहले से फ़िल्म निर्माण का कार्य करते रहे हैं किन्तु उनका कोई प्रमाणिक रिकार्ड उपलब्ध नहीं होने के कारण उनके कार्यों को रेखांकित करना शोध का विषय है। जिन लोगों ने हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में कदम रखा उनके कार्यों का लेखा जोखा सरेआम मौजूद है ज़रूरत है इन पर एक दृष्टि डालने की और पूरे आंकड़ों को ईमानदारी से लिपिबद्ध करने की । जॉलीवुड की फ़िल्मी धरातल पर अगर नज़र डालें तो 1988 में दृश्यांतर इंटरनेशनल के बैनर तले बनी एक हिन्दी फ़िल्म ''आक्रांत'' को पहले पड़ाव पर रख सकते हैं। झारखंड की मौलिक समस्याओं पर बनी इस फ़िल्म में सूदखोरी , जंगल क्षरण , मजदूर पलायन को बिनोद कुमार के निर्देशन में चित्रित किया गया था । इसकी शूटिंग राजाडेरा (नेतरहाट) , एवं रांची सहित मुंबई के फ़िल्मसिटी , फेमस स्टूडियो तथा बोरीवली के जंगलों में भी की गई थी । इसके मुख्य कलाकारों में सदाशिव अमरापुरकर , श्रीला मजुमदार , शकीला मज़ीद , सी.एस.दुबे सहित झारखंड के कलाकारों में बलदेव नारायण ठाकुर , विश्वनाथ उरांव , मसूद जामी , तापस चक्रवर्ती , और अन्य थे । डॉ. रामदयाल मुंडा ने इस फ़िल्म में संगीत पक्ष को संभाला था । बकौल निर्देशक इस फ़िल्म को एक मिशन की तरह लिया गया था किन्तु कई कारणों से यह फ़िल्म सिनेमा हॉल के पर्दे तक नहीं पहुंच पाई। 1990 में दूरदर्शन ने इसका प्रीमियर किया और इसका वीडियो रिलीज़ टाइम्स मैगज़ीन ने निकाला था। ''सोना कर नागपुर'' जॉलीवुड में बनने वाली संभवत: पहली नागपुरी फ़िल्म है जिसने न केवल सिनेमाहॉल के पर्दे पर अपने को प्रतिबिंबित किया वरन नागपुरी दर्शकों को गांव और खेतों से निकाल कर सिनेमा हॉल की कुर्सियों और ज़मीन पर बैठने को उद्वेलित भी किया । इसके निर्माता निर्देशक धनंजय नाथ तिवारी के अनुसार उन्होने तो अपने सपनों को साकार किया किन्तु तकनीकी पहलुओं की अल्प जानकारी के कारण इस फ़िल्म को अधिक धारदार नहीं बना सके । मां छिन्नमस्तिके प्रोडक्षन के बैनर तले बनने वाली इस फ़िल्म में पुरूषोत्तम तिवारी, सोसन बाड़ा, पुष्पा कुल्लु, मुकुन्द नायक, धनंजयनाथ तिवारी सहित अन्य सभी कलाकार झारखंड के ही थे । इसके बाद जॉलीवुड में एक और नागपुरी फ़िल्म ने जन्म लिया ''प्रीत''। पहले से स्थापित सालेम म्युज़िक ग्रुप का एक नागपुरी ऑडियो कैसेट रांची और आसपास के इलाके में धूम मचा रखा था । इस ऑडियो कैसेट की पूरी परिकल्पना सालेम ग्रुप की ही थी । इस ऑडियो कैसेट की सफलता के बाद एक योजना के अंतर्गत सोना कर नागपुर की तर्ज पर ही इस फ़िल्म को 16 मिमी कैमरे से शूट किया गया किन्तु लचर कथानक और निर्देशकीय कमजोरियों के कारण यह फ़िल्म फ़्लॉप साबित हुई। जॉलीवुड की फ़िल्मों में अच्छा व्यवसाय करने वाली फ़िल्मों में ''सजना अनाड़ी'' का नाम लिया जा सकता है। 1998-99 में बनी इस फ़िल्म की शूटिंग रांची के आसपास चान्हों , रामगढ़ , मैकलुस्कीगंज आदि जगहों पर की गई थी । इसकी सफलता के पीछे हाथ था इसके निर्देशक कलकत्ता के प्रवीर गांगुली का जिसने नागपुरी के साथ थोड़ी आधुनिकता को मिलाया था जिसके कारण इस फ़िल्म को प्रदर्शन के समय हल्का विरोध भी झेलना पड़ा था । इस फ़िल्म की कथानक मज़बूत थी जिसे लिखा था स्वयं इसके निर्माता युगलकिशोर मिश्र ने । इसमें काम करने वाले कलाकारों में एक दो बाहरी कलाकारों के साथ युगलकिशोर मिश्र, सोनी बबीता, शेखर वत्स, जीतेन्द्र वाढेर सहित अन्य सभी कलाकार इसी क्षेत्र के थे । नागपुरी फ़िल्म निर्माण के इस तेज़ रफ्तार में ''गुईया नंबर वन'' भी शामिल हुआ । निर्देशक थे आभाष शर्मा । कुछ बाहरी कुछ भीतरी कलाकारों को लेकर बनने वाली यह फ़िल्म भी कुछ कर नहीं पायी। 2001 से लेकर 2005 तक झारखंड कोई यादगार फ़िल्म बनाने में सफल नहीं हो सका। यहां और इस प्रदेश के बाहर निवास करने वाले लोगों को लगने लगा कि यहां छोटे बजट की नागपुरी फ़िल्में और एलबम बनाकर ही कुछ बिजनेस किया जा सकता है इसलिए छोटे बजट की नागपुरी फ़िल्मों और एलबम का बाजार बनने लगा । झारखंड प्रदेश का प्रथम नागपुरी एलबम बनाने का श्रेय जाता है धनंजय नाथ तिवारी को । ''झांझोरानी'' के नाम से उन्होंने ही पहला नागपुरी एलबम बनाया । इसके बाद इस क्रम में टुअर, सलाम, पूर्णिमा, डोली, माय कर दुलारा, बेदर्दी गुइया, पगला दिवाना, चिंगारी, जख्मी दिल, मितवा परदेशी आदि ढेर सारी फ़िल्में और एलबम बनी लेकिन इनकी हालत रेत की दीवार की तरह ही रह गई । कोई ठोस आधार इन फ़िल्मों ने नहीं बनाया । साथ ही वीडियो पर शूट कर सिनेमा हॉल के पर्दे पर चलाने का प्रयोग उत्साहवर्धक नहीं कहा जा सकता । सभी का हश्र वही हुआ जो कच्चे घड़े की आकृति का होता है । अलबत्ता श्री प्रकाश द्वारा बनाया गया वीडियो वृत चित्र देश विदेश में खूब नाम और प्रशंसा पाया । ''बुध्दा वीप्स एट जादूगोड़ा'' नाम की डॉक्युमेंट्री कई पूर्वी देशों में प्रदर्शित की गई और कई जगहों से सम्मानित भी हुई । प्रायोगिक वीडियो फ़िल्मों में ''वर्ड्स टू से'' भी एक सफल प्रयोग साबित हुआ क्योंकि कम समय कम लागत कम संसाधन कम लोकेशन कम लाइट कम कलाकारों के साथ फ़िल्म बनाने का प्रयोग था यह । प्रो. सुशील अंकन ने संप्रेषण की भाषा के स्थान पर केवल संवेदनाओं के संप्रेषण से ही फ़िल्म का निर्माण किया । झारखंड प्रदेश में बनने वाली इस तरह की प्रायोगिक फ़िल्मों की यह पहली कड़ी है । जॉलीवुड में फ़िल्म निर्माण की असीम संभावनाएं हैं। ज़रूरत है इस क्षेत्र में कुशलता और तकनीक की । आशा जगती है जब नज़र जाती है करीमसीटी कॉलेज जमशेदपुर और संत जेवियर कॉलेज रांची के मास कम्युनिकेशन एंड विडियो प्रोडक्षन विभाग की ओर जहां विद्यार्थी फ़िल्म बनाने की बारीकियों को सीख रहे है समझ रहे हैं। उनके बीच से अगर कोई फिल्म मेकर उभर कर सामने आता है तो विश्वास है कि उस फ़िल्म को निश्चित ही सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, औद्योगिक एवं राजनैतिक मान्यता मिलेगी जो अभी तक जॉलीवुड के किसी भी फ़िल्म को नहीं मिल सकी है । इस क्षेत्र में फ़िल्म निर्माण को निष्चित रूप से औद्योगिक मान्यता एवं वाणिज्यिक समर्थन मिलेगा ऐसा मेरा विश्वास है ।
हिन्दी फ़िल्मों से हम प्यार करते हैं वे कैसी भी हों, हम देखते हैं, तारीफ़ करते हैं, आलोचना करते हैं लेकिन देखना नहीं छोडते, इसी को तो प्यार कहते हैं । हमारी हिन्दी फ़िल्मों में मौत को जितना "ग्लैमराईज" किया गया है उतना शायद और कहीं नहीं किया गया होगा । यदि हीरो को कैन्सर है, तो फ़िर क्या कहने, वह तो ऐसे मरेगा कि सबकी मरने की इच्छा होने लगे और यदि उसे गोली लगी है (वैसे ऐसा कम ही होता है, क्योंकि हीरो कम से कम चार-छः गोलियाँ तो पिपरमेंट की गोली की तरह झेल जाता है, वो हाथ पर गोली रोक लेता है, पीठ या पैर में गोली लगने पर और तेज दौडने लगता है), खैर... यदि गोली खाकर मरना है तो वह अपनी माँ, महबूबा, दोस्त, जोकरनुमा कॉमेडियन, सदैव लेटलतीफ़ पुलिस आदि सबको एकत्रित करने के बाद ही मरता है । जितनी देर तक वो हिचकियाँ खा-खाकर अपने डॉयलॉग बोलता है और बाकी लोग मूर्खों की तरह उसका मुँह देखते रहते हैं, उतनी देर में तो उसे गौहाटी से मुम्बई के लीलावती तक पहुँचाया जा सकता है । हीरो गोली खाकर, कैन्सर से, कभी-कभार एक्सीडेंट में मरता तो है, लेकिन फ़िर उसकी जगह जुडवाँ-तिडवाँ भाई ले लेता है, यानी कैसे भी हो "फ़ुटेज" मैं ही खाऊँगा ! साला..कोई हीरो आज तक सीढी से गिरकर या प्लेग से नहीं मरा ।चलो किसी तरह हीरो मरा या उसका कोई लगुआ-भगुआ मरा (हवा में फ़डफ़डाता दीपक अब बुझा कि तब बुझा..बच्चा भी समझने लगा है कि दीपक बुझा है मतलब बुढ्ढा चटकने वाला है...) फ़िर बारी आती है "चिता" की और अंतिम संस्कार की । उज्जैन में रहते हुए इतने बरस हो गये, लोग-बाग दूर-दूर से यहाँ अंतिम संस्कार करवाने आते हैं, आज तक सैकडों चितायें देखी हैं, लेकिन फ़िल्मों जैसी चिता... ना.. ना.. कभी नहीं देखी, क्या "सेक्सी" चिता होती है । बिलकुल एक जैसी लकडियाँ, एक जैसी जमी हुई, खासी संख्या में और एकदम गोल-गोल, "वाह" करने और तड़ से जा लेटने का मन करता है... फ़िर हीरो एक बढिया सी मशाल से चिता जलाता है, और माँ-बहन-भाई-दोस्त या किसी और की कसम जरूर खाता है, और इतनी जोर से चीखकर कसम खाता है कि लगता है कहीं मुर्दा चिता से उठकर न भाग खडा हो...। यदि चिता हीरोईन की है, और वो भी सुहागन, फ़िर तो क्या कहने । चिता पर लेटी हीरोईन ऐसी लगती है मानो "स्टीम बाथ" लेने को लेटी हो और वह भी फ़ुल मेक-अप के साथ । हीरो उससे कितना भी लिपट-लिपट कर चिल्लाये, मजाल है कि विग का एक बाल भी इधर-उधर हो जाये, या "आई-ब्रो" बिगड़ जाये, चिता पूरी जलने तक मेक-अप वैसा का वैसा । शवयात्रा के बाद बारी आती है उठावने या शोकसभा की । हीरो-हीरोईन से लेकर दो सौ रुपये रोज वाले एक्स्ट्रा के कपडे भी एकदम झकाझक सफ़ेद..ऐसा लगता है कि ड्रेस-कोड बन गया हो कि यदि कोई रंगीन कपडे पहनकर आया तो उसे शवयात्रा में घुसने नहीं दिया जायेगा । तो साथियों आइये कसम खायें कि जब भी हमारी चिता जले ऐसी फ़िल्मी स्टाईल में जले, कि लोग देख-देखकर जलें । जोर से बोलो...हिन्दी फ़िल्मों का जयकारा...
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Wednesday, March 26, 2008
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